हमारी नजर साध्य (लक्ष्य) पर रहती है, साधनों पर नहीं। यदि हमारे साधन बिल्कुल ठीक हैं, तो साध्य की प्राप्ति होगी ही।
अपने जीवन में मैंने जो एक श्रेष्ठतम पाठ सीखा, वह यह है कि किसी भी कार्य के साधनों के विषय में उतना ही सावधान रहना चाहिए, जितना कि उसके लक्ष्य के विषय में। जिनसे मैंने यह बात सीखी, वे एक बड़े महात्मा थे। यह महान तत्व स्वयं उनके जीवन में प्रत्यक्ष कार्यरूप में परिणत हुआ था। इस एक तत्व से मैं सर्वदा बड़े-बड़े पाठ सीखता आया हूं। मेरा यह मत है कि सब प्रकार की सफलताओं की कुंजी इसी तत्व में है - साधनों की ओर भी उतना ही ध्यान देना आवश्यक है, जितना कि साध्य की ओर।
हमारे जीवन में एक बड़ा दोष यह है कि हम साध्य (लक्ष्य) पर ही अधिक ध्यान दिया करते हैं। हमारे लिए लक्ष्य अधिक आकर्षक होता है। यह मोहक होता है। हमारे मन पर इतना प्रभाव डालता है कि उसकी प्राप्ति के साधनों की बारीकियां हमारी नजर से निकल जाती हैं।
लेकिन कभी विफलता मिलने पर हम यदि बारीकी से उसकी छानबीन करें, तो निन्यानबे प्रतिशत यही पाएंगे कि उसका कारण था हमारा साधनों की ओर ध्यान न देना। हमें आवश्यकता है अपने साधनों को मजबूत बनाने की। उन्हें पूर्ण रूप से कार्यक्षम करने के लिए उनकी ओर अधिक ध्यान देने की। यदि हमारे साधन बिल्कुल ठीक हैं, तो साध्य की प्राप्ति अवश्य होगी।
अक्सर हम यह भूल जाते हैं कि कारण ही कार्य का जन्मदाता है, कार्य कभी अपने आप पैदा नहीं हो सकता। जब तक कारण बिल्कुल ठीक, योग्य और सक्षम न हों, कार्य की उत्पत्ति नहीं होगी। एक बार हमने ध्येय निश्चित कर लिया और उसके साधन पक्के कर लिए, तब फिर हम ध्येय को लगभग छोड़ सकते हैं। कारण यह है कि ऐसी स्थिति में हमें यह अच्छी तरह मालूम होता है कि अगर साधन दोषहीन है, तो साध्य कहीं नहीं जाएगा। उसे आना ही है। जब कारण विद्यमान है, तो कार्य की उत्पत्ति होगी ही। उसके बारे में विशेष चिंता की कोई आवश्यकता नहीं।
यदि कारण के विषय में हम सावधान रहें, तो कार्य स्वयं आ ही जाएगा। कार्य है ध्येय की सिद्धि और कारण हैं साधन। इसलिए साधन की ओर ध्यान देते रहना जीवन का एक बड़ा रहस्य है। गीता में भी हमने यही पढ़ा और सीखा है कि हमें लगातार अपनी पूरी ताकत से काम करते ही जाना चाहिए। काम चाहे कोई भी हो, हमें अपना पूरा मन उस ओर लगा देना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रहे कि हम उस कार्य में आसक्त न हो जाएं। अर्थात अपने कर्म से किसी भी विषय द्वारा हमारा ध्यान न हटे, फिर भी हममे इतनी शक्ति हो कि हम इच्छानुसार उस कर्म को छोड़ भी सकें। यही अनासक्त कर्म है।
